चंपावत के विद्यार्थियों की कलम से सृजन, अभिव्यक्ति और पहचान की एक अभिनव यात्रा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 विद्यार्थियों में रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, संप्रेषण कौशल और अभिव्यक्ति क्षमता के विकास पर विशेष बल देती है। इसी शैक्षिक दृष्टिकोण को विद्यालयी स्तर पर साकार करने के उद्देश्य से जनपद चंपावत में “मेरी कलम मेरी पहचान” नामक नवाचारी अभियान की शुरुआत की गई। इस अभियान का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल लेखन का अभ्यास कराना नहीं, बल्कि उन्हें अपने विचारों, अनुभवों, भावनाओं, सपनों, सामाजिक सरोकारों और स्थानीय संस्कृति को अपनी कलम के माध्यम से व्यक्त करने का अवसर प्रदान करना है। अभियान की परिकल्पना एवं समन्वयन डॉ. कमल गहतोड़ी, व्याख्याता, जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान लोहाघाट, जनपद चंपावत द्वारा किया गया है। अभियान को मुख्य शिक्षा अधिकारी मानसिंह,जनपद चंपावत; जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान लोहाघाट के प्राचार्य दिनेश खेतवाल तथा प्रकाश चंद्र उपाध्याय के मार्गदर्शन एवं सहयोग से आगे बढ़ाया जा रहा है। संपादक मंडल में डॉ. कमल गहतोड़ी, दिनेश खेतवाल, शंकर सिंह अधिकारी, प्रकाश चंद्र उपाध्याय तथा चयनित डीएलएड प्रशिक्षु शामिल हैं।

16 विद्यालयों से शुरू हुई रचनात्मक यात्रा
जनपद चंपावत के 16 चयनित विद्यालयों में संचालित यह अभियान विद्यार्थियों को पूरे वर्ष विभिन्न विषयों पर रचनात्मक लेखन के लिए प्रेरित करता है। प्रत्येक माह विद्यार्थियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यक्तिगत और शैक्षिक विकास से जुड़े विषय निर्धारित किए गए हैं। इनमें “मेरा भारत–मेरा संविधान”, “मेरा परिवार–मेरी पहचान”, “मेरी उपलब्धियाँ–मेरे सपने”, “मेरे शिक्षक–मेरा गर्व”, “मेरा गाँव–मेरी धरोहर”, “स्वतंत्रता और राष्ट्र प्रेम”, “विज्ञान, नवाचार और डिजिटल दुनिया” तथा “मेरा उत्तराखण्ड–मेरे त्योहार” जैसे विषय शामिल हैं। इन विषयों के माध्यम से विद्यार्थियों को अपने पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर अपने परिवार, विद्यालय, गाँव, समाज, पर्यावरण, संस्कृति, राष्ट्र और बदलती तकनीकी दुनिया को समझने तथा उस पर अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलता है। इस प्रकार लेखन स्वयं एक अनुभवात्मक अधिगम प्रक्रिया का रूप ले लेता है।
लेखन से विकसित होते अनेक कौशल
“मेरी कलम मेरी पहचान” को केवल एक लेखन प्रतियोगिता के रूप में देखना इस पहल के व्यापक उद्देश्य को सीमित कर देगा। यह विद्यार्थियों में पठन, लेखन, श्रवण और वाचन जैसे भाषा कौशलों के साथ-साथ कल्पनाशीलता, अवलोकन, चिंतन और प्रस्तुतीकरण क्षमता विकसित करने का प्रयास है। जब विद्यार्थी किसी विषय पर लिखता है, तो उसे जानकारी एकत्र करनी पड़ती है, अपने अनुभवों पर विचार करना पड़ता है, विचारों को क्रमबद्ध करना पड़ता है और फिर उन्हें प्रभावी भाषा में प्रस्तुत करना पड़ता है। इस प्रक्रिया से विद्यार्थियों में रचनात्मक एवं आलोचनात्मक चिंतन, शोधपरक दृष्टिकोण और आत्म-अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित होती है। अपनी रचनाओं को दूसरों के सामने प्रस्तुत करने और प्रकाशित होते देखने से उनमें आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को भी बढ़ावा मिलता है।
अपनी संस्कृति और परिवेश को शब्द देती कलम
इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पक्ष विद्यार्थियों को उनके स्थानीय परिवेश और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है। जब बच्चे अपने गाँव, लोककथाओं, त्योहारों, लोक परंपराओं, प्रकृति और स्थानीय जीवन पर लिखते हैं, तो वे अपने आसपास की दुनिया को नए दृष्टिकोण से देखने लगते हैं। इस दृष्टि से विद्यार्थियों की रचनाएँ केवल साहित्यिक अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय ज्ञान, संस्कृति और विरासत के दस्तावेजीकरण का माध्यम भी बन सकती हैं। चंपावत की स्थानीय पहचान को बच्चों की अपनी भाषा और दृष्टि से दर्ज करना इस अभियान को विशेष महत्व प्रदान करता है।
अभियान के प्रथम चरण में विद्यार्थियों की रचनात्मक अभिव्यक्तियों को एक साझा मंच मिला। इस अंक के माध्यम से अभियान की मूल भावना—विद्यार्थी की अपनी आवाज़ और उसकी अपनी पहचान—सामने आती है।
द्वितीय अंक अभियान की निरंतरता और विद्यार्थियों की बढ़ती सहभागिता को प्रस्तुत करता है। इसमें विद्यार्थियों की रचनाओं के माध्यम से उनके अनुभवों, विचारों और कल्पनाशीलता की विविध झलक देखने को मिलती है।
तृतीय अंक इस रचनात्मक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए विद्यार्थियों के लेखन को एक और व्यापक मंच प्रदान करता है। इन प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से बच्चों में विकसित हो रही अभिव्यक्ति, अवलोकन और चिंतन क्षमता को देखा जा सकता है।
“मेरी कलम मेरी पहचान” का मूल संदेश सरल है—हर बच्चे के भीतर कुछ कहने के लिए है। आवश्यकता केवल उसे सुनने और अभिव्यक्ति का अवसर देने की है। जब कोई विद्यार्थी अपनी कहानी, कविता, संस्मरण या अनुभव लिखता है, तो वह केवल शब्दों को कागज पर नहीं उतारता; वह अपने विचारों, संवेदनाओं और अपने परिवेश को दर्ज करता है। चंपावत के 16 विद्यालयों से प्रारंभ हुई यह पहल इस विश्वास को मजबूत करती है कि लेखन बच्चों को केवल भाषा नहीं सिखाता, बल्कि उन्हें सोचने, प्रश्न करने, महसूस करने, संवाद करने और अपनी पहचान बनाने का अवसर देता है।
“कलम केवल शब्द नहीं लिखती, वह व्यक्तित्व गढ़ती है और भविष्य का निर्माण करती है।”— डॉ. कमल गहतोड़ी




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